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भारत के अति प्राचीन शहर पैठण में "श्री महेश चौक" का भूमिपूजन संपन्न


माहेश्वरी समाज के 5152 वें स्थापना दिवस, महेश नवमी (11 जून 2019) के पावन अवसर पर पैठण में पाचोड फाटा पर नियोजित श्री महेश चौक का भूमिपूजन समारोह बड़े धूमधाम से और उत्साह के साथ संपन्न हुवा। इस समारोह में पैठण के विधायक संदीपानजी भुमरे, नगराध्यक्ष सूरजजी लोळगे, महाराष्ट्र प्रदेश माहेश्वरी सभा के अध्यक्ष मधुसूदनजी गांधी, पैठण के समस्त माहेश्वरी समाजजन एवं शहर के अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

"पैठण", महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में परमपावन गोदावरी नदी के उत्तरी तट पर स्थित है। इसका प्राचीन नाम 'प्रतिष्ठान' है। पैठण दक्षिण भारत के अति प्राचीन नगरों में से एक है। यह अति प्राचीन व्यापारिक और धार्मिक स्थान है। यह महाराष्ट्र के वारकरी सम्प्रदाय का तीर्थस्थल और प्रसिद्ध संत एकनाथ महाराज की जन्मभूमि है। पैठण के माहेश्वरी समाजजनों की दिली भावना थी की इस ऐतिहासिक पैठण नगरी में "श्री महेश चौक" होना चाहिए। समाजजनों के इस भावना का संज्ञान लेते हुए पैठण के माहेश्वरी समाज के युवा कार्यकर्ताओं ने, गणमान्य समाजबंधुओं और माहेश्वरी सभा के पदाधिकारियों ने इस कार्य के लिए कोशिश की, पैठण के विधायक संदीपानजी भुमरे ने माहेश्वरी समाजजनों की भावनाओं का आदर करते हुए इसमें विशेष सहयोग प्रदान किया जिसके चलते 11 जून, महेश नवमी के दिन पैठण के पाचोड फाटा पर इस नियोजित श्री महेश चौक का भूमिपूजन समारोह के बड़े धूमधाम से और उत्साह के साथ संपन्न हुवा।

इस कार्यक्रम के उद्घाटक विधायक भुमरे ने इस समय कहा की यह महेश चौक अति संदर, उत्कृष्ट और दर्जेदार बनाया जायेगा। यह चौक पैठण नगरी के सुंदरता और वैभव में अपनी एक अलग गौरवमय छाप छोड़ेगा। कार्यक्रम के अध्यक्ष मधुसूदनजी गांधी ने अपनी प्रसन्नता जाहिर करते हुए इस महेश चौक की संकल्पना को सराहा और पैठण के समस्त समाजजनों को और इस चौक के लिए विशेष परिश्रम करनेवाले सभी को धन्यवाद दिया। इस समारोह में प्रमुख अतिथि नगराध्यक्ष सूरजजी लोळगे, दूध संघ के उपाध्यक्ष नंदूअन्ना काळे, नाथ मंदिर के विस्वस्त दादा पा. बारे, पूर्व नगराध्यक्ष सोमनाथ दादा परदेशी, विनोदजी बोबले, अन्नाभाऊ लबडे, DYSP राठोडसाहेब, PI देशमुख साहेब, BDO भास्कर तात्या कुलकर्णी, बलिराम पा. औटे, CO जाधव साहेब, राजस्थान युवक मंडल के अध्यक्ष सुनिलजी बलदवा, औरंगाबाद जिला माहेश्वरी सभा के अध्यक्ष रमेशजी दरक, राज मानधने, पडुळे साहेब, नामदेवजी खरात, उपअभियंता बोरकरसाहेब, कापसेसाहेब, साईनाथ सोलाट व समस्त माहेश्वरी परिवार, समाज बांधव, पदाधिकारी, मित्र परिवार आदि बड़ी संख्या में उपस्थित थे।



क्या फर्क है इन 2 सिम्बॉल के बिच में? इनमें से कौनसा सिम्बॉल है सर्वोच्च?


देश के सिम्बॉल अशोकचक्रवाले तिरंगे और भाजपा का सिम्बॉल कमल के फूल में जितना फर्क है उतना ही फर्क है माहेश्वरी समाज के सिम्बॉल "मोड़' और महासभा के सिम्बॉल कमल के फूल पर शिवलिंगवाले सिम्बॉल में.

जैसे तिरंगा हरएक भारतीय की, भारत देश की पहचान है और कमल का फूल यह सिम्बॉल भारतीय जनता पार्टी का सिम्बॉल है, जो वर्तमान समय में सत्ताधारी पार्टी है तथा देश का नेतृत्व कर रही है; वैसे ही 'मोड़' (एक त्रिशूल जिसके बिच के पाते में एक वृत्त और वृत्त के मध्य में ॐ होता है) हरएक माहेश्वरी की, माहेश्वरी समाज की पहचान है और कमल के फूल पर शिवलिंगवाला सिम्बॉल 'माहेश्वरी महासभा' इस संगठन का सिम्बॉल है, जो वर्तमान समय में माहेश्वरी समाज का नेतृत्व कर रहा है.

मोड़ (एक त्रिशूल जिसके बिच के पाते में एक वृत्त और वृत्त के मध्य में ॐ होता है), यह सिम्बॉल माहेश्वरी समाज का, माहेश्वरी संस्कृति का प्रतीकचिन्ह (सिम्बॉल) है, गौरवचिन्ह है. समाज का नेतृत्व करनेवाले संगठन का यह पहला कार्य होता है की समाज के संस्कृति का, समाज की विशिष्ठ पहचान का, समाज के प्रतीकों का, गौरवचिन्हों का संरक्षण-संवर्धन करें... लेकिन पता नहीं माहेश्वरी समाज का नेतृत्व करनेवाला संगठन 'माहेश्वरी महासभा' क्यों समाज के प्रतीकचिन्ह 'मोड़' की उपेक्षा करता है, उसे अनदेखा करता है. अबतक जो हुवा सो हुवा लेकिन अब महासभा को माहेश्वरी समाज के प्रतीकचिन्ह 'मोड़' का पुरे सम्मान और प्रोटोकॉल के अनुसार प्रयोग करना चाहिए.

संगठन में तो कुल समाज के कुछ दस-बीस प्रतिशत लोग सदस्य बनते है, संगठन का सिम्बॉल उन संगठन के सदस्यों की, संगठन की पहचान होता है लेकिन समाज का प्रतीकचिन्ह (सिम्बॉल) समस्त समाज की, समाज के हरएक व्यक्ति की पहचान होता है. समाज का प्रतीकचिन्ह समस्त समाज को एकता के अटूट बंधन में बांधे रखने का कार्य करता है इसलिए यह जरुरी है की समाज के प्रतीकचिन्ह का यथोचित एवं ससम्मान प्रयोग किया जाये. आम माहेश्वरी लोग अपनी अपनी क्षमता के अनुसार, उन्हें जो मंच मिले, जो माध्यम मिले उसका प्रयोग करके माहेश्वरी समाज के मूल प्रतीकचिन्ह की पहचान को, समाज की इस विशिष्ठ पहचान को कायम रखने का प्रयास कर रहे है, इसके लिए इनका जितना अभिनन्दन किया जाये, धन्यवाद किया जाये... कम ही है; लेकिन ना जाने क्यों समाज का नेतृत्व करनेवाला संगठन 'माहेश्वरी महासभा' अपने संगठन के सिम्बॉल को ही समाज का सिम्बॉल सिद्ध करने की गलत कोशिश करता रहा है, कर रहा है. महासभा को समझना चाहिए की उनकी यह कोशिश कभी भी सफल तो हो ही नहीं सकती क्योंकि कहीं ना कही, कोई ना कोई अपने समाज के इस गौरवचिन्ह "मोड़" के सम्मान की लड़ाई लड़ता रहेगा. समाज का जो गौरवचिन्ह पिछले 5000 वर्षों में भुलाया नहीं जा सका, क्या आगे उसे भुलाया जाना संभव है? अ. भा. माहेश्वरी महासभा यह संगठन खुद को समाज से ऊपर समझने लगा है यह धारणा आम माहेश्वरीयों मन में घर कर जाये और आम माहेश्वरी लोग महासभा से दुरी बना लें इससे पहले महासभा अतीत में हुई अपनी भूलों को सुधार लें यह महासभा के भी हित में है और समाज के भी हित में है.

जैसे कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं बल्कि देश सर्वोपरि होता है वैसे ही समाज के लिए कार्य करनेवाला कोई भी संगठन नहीं बल्कि समाज सर्वोपरि होता है. सिर्फ अपने संगठन को ही समाज समझने की जो भूल जाने-अनजाने में अबतक महासभा से हुई है, लेकिन अब आशा करते है की महासभा अपनी भूल को दुरुस्त करके सही मायने में समस्त माहेश्वरी समाज का नेतृत्व करने की और अग्रेसर होगी. महासभा खुद को समाज पर शासन करनेवाला संगठन नहीं समझें बल्कि समाजसेवक बनकर समाज की सेवा करनेवाला संगठन बने यह ना सिर्फ समाज के बल्कि महासभा के भी हित में होगा. समाज और समाज का नेतृत्व करनेवाला संगठन, इन दोनों के बिच के फर्क को समझे महासभा. इस बात के सार को समाज को, समाजजनों को भी समझना चाहिए. समाज के लोगों को यह बात समझ में नहीं आना ऐसा है जैसे देश के सिम्बॉल अशोकचक्रवाले तिरंगे और भाजपा का सिम्बॉल कमल के फूल में क्या फर्क है यह समझ में नहीं आना.

समाज का सिम्बॉल और संगठन का सिम्बॉल इन दोनों के बिच के फर्क को अधिक विस्तार से समझने के लिए कृपया इस link पर click कीजिये >

समाज, समाज का सिम्बॉल, समाज का सम्मान सर्वोपरि है


समाज का कोई भी संगठन 'समाज' से ऊपर नहीं होता,

संगठन नहीं, समाज है सर्वोपरि !

माहेश्वरी वंशोत्पत्ति दिवस "महेश नवमी" के समारोह में, इस समारोह के कार्यक्रम पत्रिका पर माहेश्वरी समाज के सिम्बॉल "मोड़" के बजाय सिर्फ माहेश्वरी महासभा के सिम्बॉल (कमलपुष्प पर शिवपिंड) छापना, प्रचारित करना ऐसे ही है जैसे की भारत के स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त के कार्यक्रम में तिरंगे ध्वज को नहीं बल्कि भाजपा या कांग्रेस इस राजनीतिक पार्टी के झंडे को फहराना. जैसे कोई भी राजनीतिक दल देश से ऊपर नहीं होता है वैसे ही समाज का कोई भी संगठन 'समाज' से ऊपर नहीं होता है इस बात को ना केवल समाज के संगठनों को, संस्थाओं को, संगठनों/संस्थाओं के पदाधिकारियों को बल्कि आम माहेश्वरीजनों को भी समझना होगा.

माहेश्वरी महासभा यह राष्ट्रिय स्तर का एक माहेश्वरी संगठन है, कुल माहेश्वरी समाज में से लगभग 10% समाजबंधु इस संगठन के सदस्य होने के कारन यह संगठन अनेको माहेश्वरी संगठनों में सबसे बड़ा संगठन है. माहेश्वरी महासभा इस संगठन का सिम्बॉल है- "कमलपुष्प पर शिवपिंड" वाला चिन्ह; यह चिन्ह माहेश्वरी महासभा इस संगठन का और इस संगठन के सदस्यों का प्रतिनिधित्व करता है. जैसे माहेश्वरी महासभा का सिम्बॉल "कमलपुष्प पर शिवपिंड" वाला चिन्ह है वैसे ही माहेश्वरी समाज का प्रतीकचिन्ह "मोड़" (एक त्रिशूल और त्रिशूल के बीच के पाते में एक वृत्त तथा वृत्त के बीच ॐ) है. मोड़ निशान माहेश्वरी समाज की सामाजिक/सांस्कृतिक/धार्मिक पहचान है जो समस्त समाज का, हरएक माहेश्वरी व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है.

उपरोक्त पैरेग्राप से आप माहेश्वरी समाज के इन 2 सिम्बॉल के बिच के अंतर को समझ गए होंगे. अब सवाल यह है की माहेश्वरी महासभा अपने संगठन के सिम्बॉल को 'समाज' का सिम्बॉल बताने पर क्यों तुली हुई है? महेश नवमी जैसे समस्त माहेश्वरी समाज के सबसे बड़े पर्व में भी माहेश्वरी महासभा और उनके पदाधिकारी समाज के सिम्बॉल का नहीं बल्कि उनके अपने संगठन के सिम्बॉल का ही प्रचार करते दिखाई देते है, ऐसा क्यों? सिर्फ 10% समाजबंधु इस संगठन के सदस्य है वो माहेश्वरी महासभा यह संगठन खुद को ही क्या "समस्त माहेश्वरी समाज" समझता है? एक तो माहेश्वरी महासभा ने वर्षों तक माहेश्वरी समाज के मूल प्रतीकचिन्ह 'मोड़' को अनदेखा किया और सिर्फ अपने संगठन के सिम्बॉल को ही प्रचारित किया ताकि समाज " संगठन के सिम्बॉल " को ही समाज का सिम्बॉल समझने के भ्रम में रहे. अब जब समाज के लोगों को माहेश्वरी समाज के निशान की जानकारी हो गई है और आम समाजबंधु इसका इस्तेमाल-प्रचार-प्रसार कर रहे है तब भी माहेश्वरी महासभा उसे अनदेखा कर रही है; महासभा का यह बर्ताव खुद को समाज से ऊपर समझनेवाला है. यह समाज के सम्मान के साथ खिलवाड़ है.

माहेश्वरी वंशोत्पत्ति दिवस "महेश नवमी समारोह" का आयोजन ज्यादातर स्थानों पर माहेश्वरी महासभा के स्थानीय संगठनों द्वारा किया जाता है. इसी बात का फायदा उठाकर माहेश्वरी महासभा और उनके पदाधिकारी महेश नवमी जैसे समस्त माहेश्वरी समाज के सबसे बड़े पर्व के समारोह में, इस समारोह के कार्यक्रम-पत्रिका में भी समाज के सिम्बॉल 'मोड़' के बजाय अपने खुद के संगठन के सिम्बॉल (कमलपुष्प पर शिवपिंड) का ही इस्तेमाल करके अपने संगठन के सिम्बॉल का प्रचार-प्रसार करके समाज का नहीं बल्कि अपने संगठन का गौरव बढ़ाने के फ़िराक में रहती है; जो की सर्वथा गलत है, अनुचित है. यह महेश नवमी के आयोजक होने का किया गया गलत इस्तेमाल है. आम माहेश्वरी समाजबंधु, माता-बहनें इस गड़बड़झाले को समझे और समाज के सम्मान में, उचित मंच पर अपनी बात कहने का साहस भी दिखाएँ. किसी को भी इस बात को भूलना नहीं चाहिए की समाज का कोई भी संगठन 'समाज' से ऊपर नहीं होता, समाज सर्वोपरि है ! समाज का सम्मान सर्वोपरि है !! समाज का निशान (सिम्बॉल) सर्वोपरि है !!!

स्थानीय स्तर पर माहेश्वरी प्रगति मंडल, महेश युवा मंच, माहेश्वरी युवक मंडल जैसे अनेको संगठनो द्वारा महेश नवमी के अवसर पर पौधारोपण, रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य चिकित्सा शिबिर आदि अनेको समाजहितकारी/देशहितकारी कार्यक्रम आयोजित किये जाते है, इन कार्यक्रमों में, इनके निमंत्रण पत्रिका / कार्यक्रम पत्रिका में माहेश्वरी समाज के निशान (सिम्बॉल) 'मोड़' का जरूर इस्तेमाल करे और समाज के गौरव को, समाज की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पहचान को कायम रखने में अपना योगदान दें.

*अधिक जानकारी के लिए कृपया इस link पर click कीजिये > Which is the Symbol of Maheshwari Community

जानिए माहेश्वरी अखाड़ा के बारेमें... क्या है विरासत, मुख्य उद्देश्य और कार्य | Maheshwari Akhada | Mahesh Navami | Maheshwari Samaj

माहेश्वरी अखाड़ा (जिसका आधिकारिक नाम "दिव्यशक्ति योगपीठ अखाड़ा" है) माहेश्वरी समुदाय का सर्वोच्च धार्मिक गुरुपीठ है, माहेश्वरी समाज की शीर्ष/सर्वोच्च धार्मिक-आध्यात्मिक प्रबंधन संस्था है. वैसे तो माहेश्वरी गुरुपीठ की परंपरा 5000 वर्ष से भी ज्यादा पुरातन है. जब इसा पूर्व 3133 में, ज्येष्ठ शुक्ल नवमी के दिन भगवान महेश जी ने माहेश्वरी समाज की वंशोत्पत्ति/उत्पत्ति की थी, इसी दिन को माहेश्वरी समुदाय माहेश्वरी समाज के स्थापना दिवस के रूपमें तथा महेश नवमी के नाम से मनाता है. तब माहेश्वरी समुदाय के स्थापना के साथ साथ ही भगवान महेश जी ने माहेश्वरी समाज को मार्गदर्शित करने का दायित्व 6 गुरुओं (ऋषियों) को सौपा था; इन्ही 6 गुरुओं द्वारा माहेश्वरी गुरुपीठ परंपरा की शुरुआत की गई थी लेकिन समय चक्र में यह माहेश्वरी गुरुपीठ परंपरा विघटित हो गई. वर्ष 2008 में माहेश्वरी समाज के इस सर्वोच्च गुरुपीठ को कानूनी एवं आधिकारिक तौर पर "दिव्यशक्ति योगपीठ अखाड़ा" के नाम से पुनः स्थापित किया गया. आधिकारिक स्थापना के समय इसका नाम "दिव्यशक्ति योगपीठ अखाड़ा" दर्ज किया गया था, लेकिन यह "माहेश्वरी अखाड़ा" के नाम से प्रसिद्ध है, लोकप्रिय है.

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माहेश्वरी अखाड़ा (दिव्यशक्ति योगपीठ अखाड़ा) के पीठाधिपति "महेशाचार्य" की उपाधि से अलंकृत होते है. महेशाचार्य पद शंकराचार्य और पोप के समकक्ष है. केवल माहेश्वरी समाज के सर्वोच्च गुरुपीठ "दिव्यशक्ति योगपीठ अखाड़ा" के अध्यक्ष (पीठाधिपति) ही "महेशाचार्य" की उपाधि से अलंकृत होने के अधिकारी है / आधिकारिक रूप से अधिकृत है. माहेश्वरी गुरुपीठ के प्रथम पीठाधिपति महर्षि पराशर थे इसलिए महर्षि पराशर "आदि महेशाचार्य" है. वर्तमान में योगी प्रेमसुखानंद माहेश्वरी "दिव्यशक्ति योगपीठ अखाड़ा (माहेश्वरी अखाड़ा)" के पीठाधिपति और महेशाचार्य हैं.

माहेश्वरी अखाड़े के विधान के अनुसार इस अखाड़े का मुख्य कार्य धर्म की, माहेश्वरी संस्कृति की रक्षा करना है. माहेश्वरी अखाड़े का मुख्य उद्देश्य माहेश्वरी समाज को संगठित करना, समृद्ध करना, सुदृढ़ करना है. समाज की संस्कृति, सांस्कृतिक पहचान बनाये रखना एवं सुव्यवस्थित प्रबंधन के माध्यम से समाज में एकता को बढ़ाना जिससे की समाज का सर्वांगीण विकास हो यह अखाड़े का प्रमुख उद्देश्य है. आवश्यक होने पर सांस्कृतिक, सामाजिक इत्यादि से सम्बन्धित कार्य भी अखाड़े के माध्यम से किये जाने का प्रावधान है. माहेश्वरी समाज, धर्म और राष्ट्र का गौरव बढ़ाने तथा इनके सर्वांगीण प्रगति और संरक्षण-संवर्धन के लिए कार्य करना माहेश्वरी अखाड़े का मुख्य उद्देश्य है.

For more info of Maheshwari Akhada please click this link > What is Maheshwari Akhada? Know About Maheshwari Akhada


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क्या है माहेश्वरी अखाड़ा? जानिए माहेश्वरी अखाड़े के बारेमें...

संक्षेप में कहें तो, माहेश्वरी वंशोत्पत्ति के अनुसार माहेश्वरीयों/माहेश्वरी समाज को धर्म के मार्ग पर चलने के लिए मार्गदर्शन करनेका दायित्व भगवान महेशजी ने ऋषि पराशर, सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी, दाधीच इन छः (6) ऋषियों को सौपा. कालांतर में इन गुरुओं ने महर्षि भारद्वाज को भी माहेश्वरी गुरु पद प्रदान किया जिससे माहेश्वरी गुरुओं की संख्या सात हो गई जिन्हे माहेश्वरीयों में सप्तर्षि कहा जाता है. इन सप्तगुरुओं ने माहेश्वरी समाज के प्रबंधन और मार्गदर्शन का कार्य सुचारू रूप से चले इसलिए एक 'गुरुपीठ' को स्थापन किया जिसे "माहेश्वरी गुरुपीठ" कहा जाता था. इस माहेश्वरी गुरुपीठ के इष्ट देव 'महेश परिवार' (भगवान महेश, पार्वती, गणेश आदि...) थे. सप्तगुरुओं ने माहेश्वरी समाज के प्रतिक-चिन्ह 'मोड़' (जिसमें एक त्रिशूल और त्रिशूल के बीच के पाते में एक वृत्त तथा वृत्त के बीच ॐ (प्रणव) होता है) और ध्वज का सृजन किया (देखें Link > Maheshwari Religious Symbol – Mod). ध्वज को "दिव्य ध्वज" कहा गया. दिव्य ध्वज (केसरिया रंग के ध्वजा पर अंकित मोड़ का निशान) माहेश्वरी समाज की ध्वजा बनी (देखें Link > Maheshwari Flag). गुरुपीठ के पीठाधिपति “महेशाचार्य” की उपाधि से अलंकृत थे, इसलिए उन्हें "महेशाचार्य" कहा जाता था (देखें Link > आदि महेशाचार्य). "महेशाचार्य" यह माहेश्वरी समाज का सर्वोच्च गुरु पद माना जाता है. इस माहेश्वरी गुरुपीठ के माध्यम से समाजगुरु माहेश्वरी समाज को मार्गदर्शित करते थे. माना जाता है की वंशोत्पत्ति के बाद कुछ शतकों तक यह गुरुपीठ परंपरा चलती रही, लेकिन समय के प्रवाह में माहेश्वरी गुरुपीठ की यह परंपरा खंडित हो गई (इसी कारन से लगभग पिछले चार हजार वर्षों से माहेश्वरी समाज के गुरुपीठ के बारे में ना किसी ने कुछ सुना ना ही किसी को इसकी जानकारी है). यह माहेश्वरीयों का, माहेश्वरी समाज का दुर्भाग्य है की जाने-अनजाने में माहेश्वरी समाज अपने गुरुपीठ और गुरूओंको भूलते चले गए. परिणामतः समाज को उचित मार्गदर्शन करनेवाली व्यवस्था ही समाप्त हो गई जिससे समाज की बड़ी हानि हुई है और आज भी हो रही है. माहेश्वरी समाजजनों को समाजहित में इस बात को गंभीरता से समझते हुए सही और उचित दिशा में कदम बढ़ाने चाहिए.

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Which is the Symbol of Maheshwari Community


सामूहिक जीवन में प्रतीकों का बड़ा महत्व है. ये प्रतिक (symbol) एक तरह से समूह की पहचान हुआ करते हैं फिर वह चाहे किसी संस्था का हो, समाज का, देश का या फिर धर्म का प्रतिक हो. ऐसा भी नहीं है कि प्रतीक चिन्ह एक ही हो, एक से ज्यादा भी हो सकते हैं. फिर भी कोई एक अति महत्वपूर्ण होता है; जो उस संस्था, समाज, देश या फिर धर्म के दर्शन से जुड़ी किसी घटना से संबद्ध होता है. प्रतिक कई श्रेणियों में हो सकते है जैसे की- चिन्ह प्रतिक, रंग प्रतीक, पदार्थ प्रतीक, प्राणी प्रतीक, पुष्प प्रतीक आदि. प्रतिक इसके विशिष्ठ पहचान और विरासत के कारण वैश्विक पहचान होते है जो उस संस्था, समाज, देश या धर्म से जुड़े लोगों के दिलों में गर्व की भावना को महसूस कराते है.

भारत का राष्ट्रीय प्रतीक (राष्ट्रीय चिन्ह्) है- "चार शेर", इसे हम भारत की राजमुद्रा भी कहते है अर्थात् यह वैश्विक स्तर पर भारत के राष्ट्रीय पहचान का आधार है, भारत की राष्ट्रिय पहचान है. जैसे हर राष्ट्र का प्रतिक-चिन्ह होता है वैसे ही हर समाज तथा धर्म का भी एक प्रतीकात्मक चिन्ह होता है. हिन्दू धर्म में स्वस्तिक और ॐ, जैन समाज में अहिंसा हाथ, इस्लाम में अर्ध चाँद एवं तारे, 786, सिख धर्म में खांडा और इसाई धर्म का क्रॉस वाला चिन्ह हम उस समाज या धर्म के प्रतीकचिन्ह के रूप में देखते है; यह सब उन समाजों/धर्मों के प्रतिक-चिन्ह है. सामाजिक या धार्मिक प्रतीक यूं ही नहीं होते हैं, इसके पीछे कुछ गंभीर दर्शन, किंवदंती या फिर कहानी हुआ करती है. ये उस समाज विशेष या धर्म विशेष की पहचान भी होती है और उससे जुड़ी भावनाएं भी होती है और उस समाज विशेष या धर्म विशेष का जीवनदर्शन भी होता है.


सनातन धर्म के प्राचीनतम पुरातनकालीन सर्वज्ञ ऋषियों ने आरम्भ में ध्वज तथा दूसरे प्रतीकों को आजकल की भाँति कल्पित नहीं बनाया था. हमें कोई एक गुण अभीष्ट है इसलिए हम उसी को अपना प्रतीक बना लें ऐसी बात नहीं थी. उस समय के प्रतीक नित्य, सर्वकालिक प्रतीक हैं. 3133 ईसापूर्व में जब भगवान महेशजी और देवी पार्वती (देवी महेश्वरी) के वरदान से माहेश्वरी वंशोत्पत्ति हुई थी (माहेश्वरी वंशोत्पत्ति के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए देखें- Maheshwari- Origin and brief History) उसी समय भगवान महेशजी ने नवनिर्मित माहेश्वरी समाज के लिए 6 गुरु भी बनाये और माहेश्वरी समाज के गुरुओं की परंपरा का प्रारम्भ किया. यह माहेश्वरी समाज के प्रबंधन की व्यवस्था थी. इस गुरु परंपरा को प्रारम्भ करके माहेश्वरी समाज को सातत्यपूर्ण मार्गदर्शन मिलता रहे इसका प्रबंध किया गया. इन गुरुओं पर माहेश्वरी समाज को मार्गदर्शित करने का दायित्व सौपा गया.

माहेश्वरी वंशोत्पत्ति के परंपरागत मान्यता के अनुसार, माहेश्वरी वंशोत्पत्ति के समय बनाये इन गुरुओं ने भगवान महेशजी द्वारा उन्हें सौपे गए दायित्व को निभाते हुए जो अनेको कार्य किये उनमें से एक महत्वपूर्ण कार्य है की उन्होंने माहेश्वरी समाज के प्रतीकचिन्ह और ध्वज का सृजन किया था. माहेश्वरी प्रतीकचिन्ह (symbol) को "मोड़" कहा जाता है. ये दो प्रतीकों से मिलकर बना है- त्रिशूल और ॐ. मोड़ चिन्ह माहेश्वरी समाज का, माहेश्वरियों का धार्मिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक चिन्ह है जो माहेश्वरी समाज के कई सिद्धांतों को ज़ाहिर रूप से दर्शाता है. इसमें एक त्रिशूल, त्रिशूल के बिच के पाते में एक वृत्त और वृत्त के अंदर ॐ होता है. माहेश्वरी ध्वज- केसरिया रंग के ध्वज पर 'मोड़' गहरे नीले रंग में अंकित होता है, इसे दिव्यध्वज कहा जाता है. आज के समय में भी देशभर में कुछेक जगहों पर मोड़ और दिव्यध्वज का प्रयोग (use) होता दिखाई देता है. लेकिन ज्यादातर समाजजन 'कमल के फूल पर शिवपिंड' वाले निशान को ही समाज का प्रतीकचिन्ह समझते है. हमें जानना चाहिए, समझना चाहिए की वास्तव में माहेश्वरी समाज का प्रतीकचिन्ह कौनसा है. हमे इसे भी समझना चाहिए की हमें इसे क्यों समझना आवश्यक है.

माहेश्वरी वंशोत्पत्ति कब हुई, कहाँ हुई, कैसे हुई, क्यों हुई इस बारे में आज ज्यादातर समाजजनों को विस्तृत तो क्या संक्षिप्त जानकारी भी नहीं है. इस "कब, कहाँ, कैसे, क्यों" की जानकारी ना होने से समाजजन माहेश्वरी जीवनदर्शन को समझ ही नहीं पा रहे है. कोई भी समाज या धर्म उसके जीवनदर्शन को समझे बिना ऐसा होता है जैसे आत्मा बिना शरीर. तब वह समाज दिशाहीन, लक्ष्यहीन, अराजक स्थिति में मार्गक्रमण करने लगता है. वह एकसाथ, एक दिशा में, एक लक्ष्य की ओर नहीं चल पाता है जिसके परिणामस्वरूप वह क्षीण तथा कमजोर हो जाता है. आज के समय में हमारे माहेश्वरी समाज की स्थिति भी कुछ ऐसी ही दिखाई दे रही है. यह जानकारी पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रहे, आनेवाली हर नई पीढ़ी इस जानकारी से अवगत होती रहे इसकी व्यवस्था करने में तथा इसके लिए बनी हुई व्यवस्था कायम रख पाने में समाज असफल रहा है. यह कार्य करने के लिए गुरु परंपरा एक सशक्त व्यवस्था होती है. हम देख सकते है की लगभग हर धर्म, हर समाज में गुरु इस कार्य का निर्वहन करते दिखाई देते है. दुर्भाग्य से माहेश्वरी समाज इस बात के महत्व को समझ नहीं पाया और यह माहेश्वरी समाज का दुर्भाग्य है की गुरु परंपरा खंडित हो गई.

गुरु परम्परा के खंडित होने के बाद समाज के प्रबंधन का दायित्व समाज के सामाजिक संगठनों के पास आया. फिर राष्ट्रिय स्तर पर के सबसे बड़े संगठन को समाज का 'नेतृत्व' माना जाने लगा (वस्तुतः माहेश्वरी महासभा को समस्त माहेश्वरी समाज का नेतृत्व भी नहीं माना जा सकता क्योंकि यह संगठन कुल माहेश्वरी समाज के सिर्फ 10% लोगों का ही प्रतिनिधित्व करता है. लेकिन राष्ट्रिय स्तर पर माहेश्वरी समाज का कार्य करनेवाला कोई अन्य सामाजिक संगठन नहीं होने के कारन एक तरह से यह माना जाता रहा है की 'माहेश्वरी महासभा' यह संगठन माहेश्वरी समाज का नेतृत्व करता है). अब यह इस सबसे बड़े संगठन की जिम्मेदारी बन गई थी की वह समाज के धार्मिक-आध्यात्मिक-सांस्कृतिक-सामाजिक प्रबंधन के कार्य को देखें. होना तो यही चाहिए था लेकिन आमतौर पर देखने में यह आता है की सामाजिक संगठन समाज के सामाजिक प्रबंधन को तो बखूबी संभाल लेते है लेकिन धार्मिक-आध्यात्मिक-सांस्कृतिक प्रबंधन इनसे संभलता नहीं है, समाज धार्मिक-आध्यात्मिक-सांस्कृतिक प्रबंधन के प्रबंधनकर्ता के रूप में सामाजिक संगठन को स्वीकारता नहीं है. यही माहेश्वरी समाज में भी हुवा. अतः समाज को नेतृत्व देनेवाले संगठन ने अपना पूरा ध्यान, अपनी पूरी शक्ति केवल सामाजिक कार्य पर ही केंद्रित कर दी. इससे माहेश्वरी समाज की धार्मिक-आध्यात्मिक-सांस्कृतिक विशिष्ठ पहचान कमजोर पड़ गई जिसका परिणाम यह हुवा है की पूरा समाज एकसाथ, एक दिशा में, एक लक्ष्य की ओर नहीं चल रहा है. आज इस बात को हम देख सकते है, अनुभव कर सकते है. यही समाज के सामने के सभी समस्याओं की जड़ है. इन सब बातों को दुरुस्त किया जाना ना केवल समाज के हित में है बल्कि समाज के अस्तित्व के स्थायित्व के लिए आवश्यक भी है.

समाज का अस्तित्व स्थाई रूप से बना रहे, समाज की विशिष्ठ पहचान कायम रहे, पूरा समाज एकसाथ, एक दिशा में, एक लक्ष्य की ओर चलता रहे तो समाज तेज गति से सर्वांगीण प्रगति की ओर अग्रेसर होता है. लेकिन इसके लिए आवश्यक है की समाज अपनी विरासत से, अपने एकात्म श्रद्धास्थान से, अपने प्रेरणा देनेवाले गौरवचिन्हों से, अपने इतिहास से जुड़ा रहे. इस मजबूत जमीन पर अपने पैरों को मजबूती से रखकर आकाश की उड़ान भरे ताकि भविष्य हमेशा सुनहरा हो ! दुर्भाग्य से समाज का नेतृत्व करनेवाले संगठन ने इन बातों के महत्व को नहीं समझा. उन्होंने ना माहेश्वरी वंशोत्पत्ति कैसे हुई इसे महत्व दिया ना माहेश्वरी समाज के इतिहास को, ना माहेश्वरी विरासत को, ना माहेश्वरी समाज के गौरवचिन्हों को.

आज वर्ष 2018 में माहेश्वरी समाज का नेतृत्व माहेश्वरी महासभा कर रहा है (ऐसा माना जाता है). माहेश्वरी महासभा की स्थापना आज से लगभग 110 वर्ष पूर्व हुई. इससे पूर्व का कुछ वर्षों का समय बिना किसी संगठन के रहा. उससे पूर्व में समय समय पर कुछ माहेश्वरी संगठनों ने कुछेक वर्षों तक समाज का नेतृत्व किया. पूर्व में बने संगठनों ने भी और वर्तमान समय में माहेश्वरी समाज का नेतृत्व कर रही माहेश्वरी महासभा ने भी समाज की विरासत और समाज के इतिहास को जाने अनजाने में अनदेखा करते हुए समाज के इन गौरवचिन्हों को दुर्लक्षित किया. आज कुछ बुजुर्ग समाजबंधुओं को यदि छोड़ दे तो ज्यादातर समाजजनों को इन चिन्हों के बारे में जानकारी ही नहीं है (समाज के इन गौरवचिन्हों की तो क्या... माहेश्वरी वंश की उत्पत्ति कैसे हुई, माहेश्वरी समाज का इतिहास क्या है इसके बारेमें भी ज्यादातर समाजजन कुछ नहीं जानते).



माहेश्वरी महासभा ने माहेश्वरी समाज के मूल प्रतीकचिन्ह 'मोड़' को कहीं भी प्रचारित ना करते हुए समाज में अपने संस्था के सिम्बॉल 'कमल के फूल पर शिवपिंड' को ही इस तरह से प्रचारित किया की जैसे यही 'माहेश्वरी समाज' का सिम्बॉल है. जबकि वास्तविकता यह है की 'कमल के फूल पर शिवपिंड' वाला यह सिम्बॉल 'माहेश्वरी महासभा' इस संस्था का सिम्बॉल है, माहेश्वरी समाज का नहीं. यह समाज का नहीं बल्कि संगठन का सिम्बॉल है (अब कोई यह ना कहे की समाज और संगठन एक ही होते है. क्योंकि समाज और संगठन यह दो अलग घटक है. समाज का अर्थ है एकसमान संस्कृति और विचारधारा को मानते हुए एक साथ रहनेवाला समुदाय/संप्रदाय. अब संगठन के अर्थ को समझे, एक ऐसी औपचारिक व्यवस्था जिसके द्वारा समुदाय/संप्रदाय के प्रबन्धन का कार्य किया जाता है उसे कहते है- संगठन). आज ज्यादातर समाजजन 'कमल के फूल पर शिवपिंड' वाले सिम्बॉल को ही माहेश्वरी समाज का सिम्बॉल समझते है (ऐसा समझने के चलते ही स्वतंत्र रूप से कार्य करनेवाले, छोटे तथा स्थानीय स्तर पर कार्य करनेवाले कुछ संगठन माहेश्वरी महासभा के सिम्बॉल 'कमल के फूल पर शिवपिंड' को ही अपने संगठन के सिम्बॉल के रूप में इस्तेमाल करते है).

माहेश्वरी महासभा इस संस्था/संगठन का सिम्बॉल इस संस्था के सौ साल के इतिहास में अबतक तीन बार बदला जा चूका है. वर्तमान समय में माहेश्वरी महासभा का 'कमल के फूल पर शिवपिंड' वाला जो सिम्बॉल है वो आज से छब्बीस वर्ष पूर्व बनाया गया था. यह सिम्बॉल पैठण, महाराष्ट्र के एकनाथजी मूंदड़ा ने डिजाइन किया था जिसे महासभा के राष्ट्रिय अधिवेशन में 'माहेश्वरी महासभा' के सिम्बॉल के रूप में स्वीकृत किया गया था (पता नहीं माहेश्वरी महासभा इस सिम्बॉल को भी कब बदल दे).

'माहेश्वरी समाज' का सिम्बॉल 'मोड़' है जिसका सृजन माहेश्वरी वंशोत्पत्ति के समय भगवान महेशजी द्वारा बनाये गए माहेश्वरी गुरुओं के द्वारा हुवा था. समाज और धर्मों के प्रतीक नित्य एवं सर्वकालिक होते है इसलिए माहेश्वरी समाज का यह प्रतीकचिन्ह 'मोड़' भी नित्य एवं सर्वकालिक है, अपरिवर्तनीय है; अर्थात इसे बदला नहीं जा सकता. कमल के फूल पर शिवपिंड और मोड़ इन दोनों सिम्बॉल के बिच के अंतर को समझने के लिए आवश्यक है की हम समाज और संगठन के बिच के अंतर को, फर्क को समझे.

संस्था (संगठन) के सिम्बॉल को समाज का सिम्बॉल बताने में गलत क्या है? इसमें समाज का क्या नुकसान है?

कुछ समाजबंधुओं के मन में यह उपरोक्त प्रश्न आ सकते है, यह उन समाजबंधुओं के मन की सरलता है की उन्हें ऐसा लगे की इसमें क्या गलत है, इसमें समाज का क्या नुकसान है? मन की सरलता के कारन ऐसा लग सकता है लेकिन ऐसा है नहीं, यह बात उतनी सरल या छोटी है नहीं की इसे एक छोटी या एक साधारण बात समझी जाये. भाइयों और बहनो, एक समाज का मतलब होता है एक संस्कृति. समाज की संस्कृति और समाज के मूल सिद्धांत होते है समाज की पहचान; और समाज का अस्तित्व आधारित होता है समाज की पहचान पर, ना की संगठन की पहचान पर. इसलिए यदि समाज की पहचान को, समाज के अस्तित्व को, समाज के गौरव को कायम रखना हो तो यह जरुरी है हम समाज की संस्कृति को, समाज के मूल सिद्धांतों को भूले नहीं. जो समाज अपनी संस्कृति को, अपने गौरवचिन्हों को, अपने इतिहास को भूल जाता है, अपनी इन जड़ों से कट जाता है उस समाज के अस्तित्व को, विशिष्ट पहचान को, गौरव को कोई नहीं बचा सकता. सार्वजनिक जीवन में प्रोटोकॉल का भी अपना एक महत्व होता है. जैसे की, भारत की राजमुद्रा 'चार शेर' और ध्वज 'तिरंगा ध्वज' है. देश को राजकीय नेतृत्व देने के लिए राजनीतिक दल की व्यवस्था होती है, जैसे की भारत में कांग्रेस, भाजपा आदि. भाजपा का प्रतीकचिन्ह है कमल का फूल, कांग्रेस का प्रतीकचिन्ह है हाथ का पंजा. "चार शेर, कमल का फूल और हाथ का पंजा" इन तीन प्रतीकचिन्हों में सर्वोच्च प्रतीकचिन्ह है 'चार शेर; क्योंकि यह समस्त राष्ट्र का प्रतीकचिन्ह है और कमल का फूल, हाथ का पंजा यह देश के लिए कार्य करनेवाले अथवा देश को नेतृत्व देनेवाले राजनीतिक दल के प्रतीकचिन्ह है; उसी तरह 'मोड़' यह समस्त माहेश्वरी समाज का प्रतीकचिन्ह है और समाज के लिए कार्य करनेवाले अथवा समाज को नेतृत्व देनेवाले माहेश्वरी महासभा का प्रतीकचिन्ह है 'कमल के फूल पर शिवपिंड', माहेश्वरी समाज के संगठनों के महासंघ 'माहेश्वरी महासंघ' का प्रतीकचिन्ह है 'एकता हाथ (unity hand)'. जैसे 'चार शेर' इस प्रतीकचिन्ह का विशेष महत्व है, इस चिन्ह के लिए देशवासियों के मन में विशेष गौरव का भाव होता है, तिरंगे ध्वज के प्रति विशेष गौरव की अनुभूति होती है उसी तरह 'मोड़' इस प्रतीकचिन्ह का विशेष महत्व है, इस चिन्ह के लिए समाजजनों के मन में विशेष गौरव का भाव होना चाहिए. दिव्यध्वज के प्रति विशेष गौरव की अनुभूति होनी चाहिए. संगठन के सिम्बॉल भी उस संगठन की पहचान होते है, संगठनों के लिए उनके अपने संगठनों के प्रतीकचिन्ह (सिम्बॉल) का जरूर महत्व है लेकिन समाज का प्रतीकचिन्ह सर्वोपरि है, समाज के प्रतीकचिन्ह का उचित सम्मान किया जाना चाहिए, यह बात समाज को और समाज के लिए कार्य करनेवाले संगठनो को विशेषरूप से ध्यान में रखनी चाहिए.


वर्तमान समय में माहेश्वरी समाज के पुनरुत्थान के लिए समाज प्रबंधन की व्यवस्था में कुछ बड़े परिवर्तन, कुछ नये व्यवस्थापन के निर्माण (नवनिर्माण) की आवश्यकता शिद्दत से महसूस की जा रही है. समाज के सौभाग्य से योगी प्रेमसुखानन्द माहेश्वरी महाराज ने इस दिशा में ठोस पहल की है. माहेश्वरी वंशोत्पत्ति के समय भगवान महेशजी ने जिस माहेश्वरी समाजगुरूओं की परंपरा शुरू की थी, इन गुरुओं ने समाज को स्थाई मार्गदर्शन मिलता रहे इसके लिए एक माहेश्वरी गुरुपीठ स्थापित किया था लेकिन समय के प्रवाह में किसी कारणवश गुरुओं एवं गुरुपीठ की यह परंपरा खंडित हो गई थी; प्रेमसुखानन्द माहेश्वरी महाराज ने इसे "माहेश्वरी अखाड़ा" के नाम से पुनर्जीवित करने का ऐतिहासिक कार्य किया है. माहेश्वरी अखाड़े की स्थापना माहेश्वरी समाज के सर्वोच्च धार्मिक-आध्यात्मिक संस्था के रूप में की गई है (स्थापना के समय इसे 'दिव्यशक्ति योगपीठ अखाड़ा' के नाम से नामांकित किया गया था लेकिन यह माहेश्वरी अखाड़ा के नाम से प्रसिद्ध है). माहेश्वरी समाज के पुनरुत्थान के लिए समाज के धार्मिक-आध्यात्मिक-सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी का निर्वहन माहेश्वरी अखाड़े के माध्यम से होगा तथा सामाजिक कार्यों को गति देने तथा सामाजिक कार्यों के निर्वहन की जिम्मेदारी समाज के लिए कार्य करनेवाले सामाजिक संगठन निभायेंगे. माहेश्वरी समाज के पुनरुत्थान के लिए शुरू किये इस अभियान का पहला कदम है समाज को समाज की जड़ों से जोड़ना, समाज के मूल सिद्धांतों से जोड़ना, समस्त समाज को एकता के सूत्र में बांधना. पुनरुत्थान और पुनर्निमाण का यह अभियान किसी एक का नहीं है बल्कि समस्त समाज का, समाज के हरएक व्यक्ति का, समाज के लिए कार्य करनेवाले हरएक संगठन का है जिसका श्रीगणेश करना है माहेश्वरी समाज की मूल पहचान, समाज के प्रतीकचिन्ह 'मोड़' को प्रेरणा बनाकर !


माहेश्वरी समाज के प्रतिक-चिन्ह 'मोड़' की अधिक जानकारी के लिए कृपया इस Link को देखें- Symbol of Maheshwari Community

विशेष सम्पादकीय- समाज की पहचान को मिटा रही है माहेश्वरी महासभा?


'माहेश्वरी महासभा' अर्थात अखिल भारतवर्षीय माहेश्वरी महासभा (ABMM), माना जाता है की राष्ट्रिय स्तर पर यह संस्था माहेश्वरी समाज का नेतृत्व करती है. राष्ट्रिय स्तर पर कार्यरत माहेश्वरी समाज की एकमात्र संस्था (संगठन) होने के नाते महासभा का दायित्व (जिम्मेदारी) था/है की यह संस्था माहेश्वरी समाज की संस्कृति को, समाज की विशिष्ट पहचान को, समाज के गौरव को बचाने, कायम रखने और बढ़ाने के लिए कार्य करें लेकिन कभी दिखाई नहीं दिया की महासभा इसके लिये गंभीर है अथवा कोई कार्य कर भी रही है. पता नहीं की महासभा को इस बात का पता भी है या नहीं की समाज का नेतृत्व करनेवाली एकमात्र संस्था होने के नाते यह उनका कार्य है, यह उनकी जिम्मेदारी है. खैर इतना क्या कम था जो अब माहेश्वरी महासभा समाज की पहचान को, समाज की संस्कृति को ही मिटाने के काम में लग गई गई. ये तो ऐसा ही है की जिस कम्पाउंड को खेती की रक्षा करने के लिये लगाया गया था वो कम्पाउंड ही खेती को खाये जा रहा है, खाने जा रहा है. पिछले कुछ समय में माहेश्वरी महासभा ने कुछ ऐसी बातें की है जिससे ऐसा लग रहा है की पांच हजार वर्षों से चली आ रही महान माहेश्वरी संस्कृति के अस्तित्व को, समाज की विशिष्ट पहचान को कहीं माहेश्वरी महासभा ख़त्म तो नहीं करना चाहती है, और लग यह रहा है की यह इतने सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है की आम समाजबंधुओं को इसकी खबर तक नहीं लग रही है. माहेश्वरी महासभा की एक ऐसी ही करतूत को समाज के सामने, समाज की अदालत में रखते हुए हमने यह प्रश्न उठाया है की "क्या समाज की पहचान को मिटा रही है माहेश्वरी महासभा?" हम जो कर सकते है, हमने किया, हम मामला समाज की अदालत में ले आये अब फैसला आम समाजबंधुओं को करना है.

इस पोस्ट के साथ आपको जो फोटो दिखाई दे रहा है, यह फोटो माहेश्वरी महासभा के राष्ट्रिय कार्यकारिणी में संयुक्त मंत्री और माहेश्वरी महासभा के राष्ट्रिय महामंत्री के कार्यालय प्रमुख श्रीमान जुगल किशोरजी सोमानी के फेसबुक अकाउंट की प्रोफ़ाइल फोटो है (देखे- Shriman Jugal kishorji Somani at Facebook). इस फोटो पर 'कमल के फूल पर शिवलिंग' का सिम्बॉल और उसके ठीक बाजु में 'माहेश्वरी' नाम लिखा हुवा है (एक app है जिसके द्वारा अपने अपने प्रोफ़ाइल फोटो पर ऐसा 'कमल के फूल पर शिवलिंग' का सिम्बॉल और उसके ठीक बाजु में 'माहेश्वरी' नाम वाला फेसबुक प्रोफ़ाइल फोटो बनता है). एक नजर में इस फोटो को देखने पर इसमें कोई गलत बात नजर नहीं आती है लेकिन जिन्हे माहेश्वरी समाज के वंशोत्पत्ति की, समाज के इतिहास की और माहेश्वरी महासभा के इतिहास की जानकारी है उन्हें यह साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा है की अपनेआप को प्रचारित करने के लिए माहेश्वरी महासभा कैसे समाज को निचा दिखा रहा है, कैसे समाजबंधुओं को गुमराह करने की कोशिश कर रहा है. माहेश्वरी समाज का सबसे बड़ा और राष्ट्रिय स्तर का एकमात्र संगठन होने के नाते जिसपर समाज की संस्कृति को, समाज की पहचान को, समाज के गौरव को, समाज के गौरवचिन्हों को बचाने-कायम रखने की जिम्मेदारी है वही माहेश्वरी महासभा कैसे समाज की संस्कृति को, समाज के गौरवचिन्हों को ख़त्म करने जैसी ओछी हरकतों पर उतर आयी है. अनेको समाजबंधुओं ने, यहाँ तक की समाज की संस्कृति, समाज के गौरव और समाज के लिए समर्पित ऐसे कुछ समाजबंधुओं ने जो की माहेश्वरी महासभा के प्रदेश और राष्ट्रिय स्तर के पदाधिकारी भी है, महासभा की इस बात को गलत बताया है. अनेको समाजबंधुओं ने माहेश्वरी महासभा के इस हरकत पर तीखी प्रतिक्रियाएं व्यक्त की है.

भाइयों और बहनों, सजगता के साथ, गौर से इस फोटो को देखें तो ध्यान में आता है की इस app के द्वारा बड़ी चालाकी के साथ "माहेश्वरी" नाम के साथ समाज का सिम्बॉल (symbol of community) "मोड़" का फोटो (मोड़, जिसमे की एक त्रिशूल और त्रिशूल के बिच के पाते में ॐ होता है) नहीं बल्कि 'माहेश्वरी महासभा' इस संस्था (संगठन) के सिम्बॉल का फोटो दिखाया गया है. बड़ी चालाकी के साथ समाजजनों को यह बताने की और प्रचारित करने की कोशिश की गई है की 'कमल के फूल पर शिवलिंग' वाला यह सिम्बॉल 'माहेश्वरी समाज' का सिम्बॉल है जबकि वास्तविकता यह है की 'कमल के फूल पर शिवलिंग' वाला यह सिम्बॉल माहेश्वरी समाज का नहीं बल्कि 'माहेश्वरी महासभा' इस संस्था का सिम्बॉल है. माहेश्वरी महासभा इस संस्था/संगठन का सिम्बॉल इस संस्था के सौ साल के इतिहास में अबतक तीन बार बदला जा चूका है; वर्तमान समय में माहेश्वरी महासभा का 'कमल के फूल पर शिवपिंड' वाला जो सिम्बॉल है वो आज से छब्बीस वर्ष पूर्व बनाया गया था (यह सिम्बॉल पैठण, महाराष्ट्र के एकनाथजी मूंदड़ा ने बनाया था जिसे महासभा के राष्ट्रिय अधिवेशन में माहेश्वरी महासभा के सिम्बॉल के रूप में स्वीकृत किया गया था. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार तो महासभा के अंदर इस वर्तमान 'कमल के फूल पर शिवलिंग' वाले सिम्बॉल को भी बदलने की मांग उठी है, पता नहीं महासभा कब इस सिम्बॉल को बदलकर फिर कोई नया सिम्बॉल अपना ले, कोई नया सिम्बॉल बना लें). माहेश्वरी समाज का सिम्बॉल 'मोड़' है जो की माहेश्वरी वंशोत्पत्ति के समय भगवान महेशजी द्वारा बनाये गए माहेश्वरी गुरुओं के द्वारा बनाया गया था. कायदे से होना तो यह चाहिए की, यदि सिर्फ 'माहेश्वरी' नाम लिखा जा रहा है तो उसके साथ माहेश्वरी समाज के सिम्बॉल 'मोड़' का फोटो होना चाहिए और माहेश्वरी महासभा को अपने सिम्बॉल का ही प्रचार करना है तो 'कमल के फूल पर शिवलिंग' वाले सिम्बॉल के साथ यह सिम्बॉल जिस संस्था का है उस संस्था 'माहेश्वरी महासभा' का नाम होना चाहिए. किसी संस्था या संगठन का सिम्बॉल दिखाया जा रहा है तो उस सिम्बॉल के साथ उस संस्था/संगठन का नाम होना चाहिए. अपनी संस्था के सिम्बॉल के साथ अपनी संस्था (माहेश्वरी महासभा) का नाम लिखने के बजाय सिर्फ "माहेश्वरी" लिखना इसमें कोई भेद, कोई रहस्य, कोई चालाकी होने का शक जरूर पैदा होता है (ऐसी ही एक चालाकी माहेश्वरी महासभा द्वारा हमेशा की जाती है. जब माहेश्वरी महासभा के अध्यक्ष, सचिव आदि पदाधिकारी चुने जाते है और उनके चुने जाने का समाचार स्थानीय समाचारपत्रों में और समाज के लिये निकलनेवाली पत्रिकाओं में दिया जाता है तो वहां 'अमुक-अमुक शहर के माहेश्वरी महासभा के अध्यक्ष बने तमुक-तमुक' ऐसा समाचार दिया जाने के बजाय समाचार दिया जाता है की 'अमुक-अमुक शहर के माहेश्वरी समाज के अध्यक्ष बने तमुक-तमुक', जबकि 95% समाजबंधुओं का इस चुनाव में कोई रोल, कोई भूमिका ही नहीं होती है, उन्हें इस बारे में कुछ पता ही नहीं होता है). माहेश्वरी महासभा को चाहिए की समाज के लिए अपने भरपूर योगदान से, अपने कामों से समाज में अपनी पहचान बनायें ना की इस तरह छुपे तरीके से अपनी संस्था के सिम्बॉल को समाज का सिम्बॉल बताकर.

माहेश्वरी महासभा द्वारा उनकी अपनी संस्था के सिम्बॉल को माहेश्वरी समाज का सिम्बॉल बताना क्या गलत है? इसमें समाज का क्या नुकसान है?
कुछ समाजबंधुओं के मन में यह उपरोक्त प्रश्न आ सकते है, यह उन समाजबंधुओं के मन की सरलता है की उन्हें ऐसा लगे की इसमें क्या गलत है, इसमें समाज का क्या नुकसान है? मन की सरलता के कारन ऐसा लग सकता है लेकिन ऐसा है नहीं, यह बात उतनी सरल या छोटी है नहीं की इसे एक छोटी या एक साधारण बात समझी जाये. भाइयों और बहनो, एक समाज का मतलब होता है एक संस्कृति. समाज की संस्कृति और समाज के मूल सिद्धांत होते है समाज की पहचान, और समाज की पहचान पर आधारित होता है समाज का अस्तित्व. इसलिए यदि समाज की पहचान को, समाज के अस्तित्व को, समाज के गौरव को कायम रखना हो तो यह जरुरी है हम समाज की संस्कृति को, समाज के मूल सिद्धांतों को भूले नहीं. जो समाज अपनी संस्कृति को, अपने गौरवचिन्हों को, अपने इतिहास को भूल जाता है, अपनी इन जड़ों से कट जाता है उस समाज के अस्तित्व को, विशिष्ट पहचान को, गौरव को कोई नहीं बचा सकता. प्रोटोकॉल का भी अपना एक महत्व होता है. जैसे की, भारत की राजमुद्रा के साथ आप 'कांग्रेस' या 'भाजपा' नहीं लिख सकते क्यों की वह कांग्रेस या भाजपा का सिम्बॉल नहीं बल्कि राष्ट्र की राजमुद्रा है; यह प्रोटोकॉल होता है. इसी तरह से समाज और सस्था/संगठन से संदर्भित प्रोटोकॉल भी निभाए जाने चाहिए जिससे की समाज का गौरव, समाज की पहचान कायम रहें.

एक तो माहेश्वरी महासभा ने बरसों बरस तक माहेश्वरी समाज के इतिहास को, समाज के मूल सिद्धांतों को, मूल गौरवचिन्ह 'मोड़' और समाज के ध्वज 'दिव्यध्वज' को अनदेखा किया और सिर्फ अपनी संस्था के सिंबॉल (कमल के फूल पर शिवलिंग' वाले सिम्बॉल) का ही प्रचार किया. समाज के मूल गौरवचिन्ह तो लगभग विस्मृत हो चले थे. ये तो भला हो सोशल मिडिया का की कुछ बुजुर्ग समाजबंधु सोशल मिडिया के माध्यम से इन्हे पुनः समाज के सामने ले आये. आम माहेश्वरी समाजबंधुओं में 'समाज के मूल सिम्बॉल- मोड़' का प्रयोग बढ़ता देखकर शायद माहेश्वरी महासभा के अहंकार को चोट पहुंची और उन्होंने माहेश्वरी महासभा के सिम्बॉल का जोर-शोर से प्रचार करने के लिए यह app बनाया है. अब तो लग रहा है की कहीं अगले चार दिन में माहेश्वरी महासभा केसरिया ध्वज पर अपने संस्था का 'कमल के फूल पर शिवलिंग' वाला निशान प्रिंट करवाकर उसे माहेश्वरी समाज का ध्वज ना बताने लगे और अगले सप्ताह यह ना कहने लगे की माहेश्वरी समाज की वंशोत्पत्ति महेश नवमी को नहीं बल्कि एकसौ दस वर्ष पहले उस दिन हुई थी जिस दिन 'माहेश्वरी महासभा' की स्थापना हुई थी. ऐसी ओछी हरकतों से समाज गुमराह होने से तो रहा बल्कि माहेश्वरी महासभा अपना खुद का मजाक बना रहा है.

माहेश्वरी महासभा हो या समाज के लिए कार्य करनेवाला कोई अन्य संगठन हो, वे अपने संगठन के सिम्बॉल का प्रचार जरूर कर सकते है, इसमें हमें या किसी को भी कोई आपत्ति नहीं है, ना होनी चाहिए लेकिन उसका तरीका सही हो, अपनी संस्था का सिम्बॉल है तो उसे अपनी संस्था का सिम्बॉल बताकर ही उसका प्रचार किया जाये. इस मामले में जिस तरह माहेश्वरी महासभा अपनी संस्था के पहचान को कायम रखने के लिए, अपनी संस्था को महिमामंडित करने के लिए समाज की संस्कृति को उखाड़ रही है, समाज की जड़ों को खोद रही है यह ना सिर्फ गलत है बल्कि यह समाज के साथ द्रोह है, समाजद्रोह है. यह समाज के सरल मन वाले समाजबंधुओं की सरलता का बेजा फायदा उठाकर उन्हें धोका देना है. इससे अच्छा तो यह होता की माहेश्वरी महासभा समाज के लिए अपने कार्य को, अपनी सेवा को बढाती जिससे की पुरे समाज में उनका नाम बढ़ें, सम्मान बढ़ें.

स्थानिक स्तर पर अर्थात शहर, तहसील, जिला स्तर पर अनेक माहेश्वरी संगठन स्वतंत्र रूप से समाज के लिए कार्यरत है लेकिन अखिल भारतीय स्तर का समाज का एकमात्र संगठन होने के कारन 'माहेश्वरी महासभा' राष्ट्रिय स्तर पर समाज का नेतृत्व करती है ऐसा माना जाता है (माहेश्वरी महासभा 'समाज नहीं है बल्कि समाज के लिए कार्य करनेवाला 'संगठन' है. संगठन नहीं बल्कि समाज सर्वोपरि होता है, समाज में से संगठन निकलते है, संगठन में से समाज नहीं). पिछले सौ वर्षों से राष्ट्रिय स्तर पर समाज का एकमुखी, एकछत्र नेतृत्व करते हुए माहेश्वरी महासभा समाज की संस्कृति को कायम रखने में, समाज को 'समाज के मूल सिद्धांतों' पर चलने की प्रेरणा देने में साफ़ नाकाम रही है, समाज के लिए कोई लक्षणीय कार्य भी नहीं कर पाई है फिर भी कोई और पर्याय ना होने के कारन समाज ने माहेश्वरी महासभा को समाज के नेतृत्व के रूप में एक मौन स्वीकृति दी हुई है, लेकिन इसका मतलब माहेश्वरी महासभा यह कतई ना समझे की समाज उनके खूटें से बंधी हुई बकरी है. लाख कमियों के बावजूद भी माहेश्वरी महासभा की जो कुछ हैसियत है समाज के कारन है, समाज के नाम के कारन है. माहेश्वरी महासभा खुद को समाज से बड़ा दिखाने की बेवकूफाना कोशिश ना करें, कहीं ऐसा ना हो की समाज उनकी तरफ पीठ कर दें.

माहेश्वरी महासभा के पदाधिकारी और कार्यकर्ता सबसे पहले समाज के घटक है और उसके बाद संगठन के कार्यकर्ता या पदाधिकारी, इसलिए हम चाहते है की वे इस बात को जरूर सोचे की आप लोग समाज की सेवा करने के लिए संगठन में हो या समाज पर शासन करने के लिए? आपकी निष्ठां, आपका दायित्व सबसे पहले समाज के लिए है या अपने संगठन के लिए? समाज की संस्कृति पर, समाज की पहचान पर कोई चोट करें, उसे मिटाने की कोशिश करें (फिर वह संगठन क्यों ना हो जिसके आप पदाधिकारी या कार्यकर्ता हो) तो इस बात को रोकना, इसका विरोध करना आपका कर्तव्य, आपका दायित्व बनता है या नहीं? आपमें गलत और सही को समझने की समझ है या नहीं? गलत को 'गलत' और सही को 'सही' कहने का साहस और मन की प्रामाणिकता आपके पास है या नहीं?

सामाजिक कार्य करने के लिए, समाजसेवा करने के लिए, समाज की संस्कृति को, समाज के गौरव को, समाज की पहचान को बचाने-कायम रखने के लिए संगठन का सदस्य या पदाधिकारी बनना जरुरी नहीं होता है, आम समाजबंधु भी इस कार्य में अपना योगदान दे सकते है बल्कि समाज सेवा के 5 मूल मंत्र के द्वारा आम समाजबंधु ही इस कार्य में सही योगदान दे सकते है.
समाजसेवा के वह 5 मूल मंत्र है-
(1) समाज के लिए लड़ाई लड़ो.
(2) लड़ नही सकते तो लिखो.
(3) लिख नही सकते तो बोलो.
(4) बोल नहीं सकते तो साथ दो.
(5) साथ भी नहीं दे सकते तो जो लिख और बोल रहे हैं ,जो लड़ रहे हैं, किसी न किसी तरीके से उनका अधिक से अधिक सहयोग करो. संघर्ष के लिए ताकत दों.
...ये भी न कर सकों तो कम से कम मनोबल न गिराये, क्योकि कहीं न कहीं कोई आपके हिस्से की भी लड़ाई लड़ रहे है.