माहेश्वरी अखाड़ा ने की 2018 के दिव्य पुरस्कारों की घोषणा

माहेश्वरी अखाड़ा के मुताबिक 20 माहेश्वरीयों को इन पुरस्कारों के लिए चुना गया है जिनमें से 2 को दिव्य विभूषण, 6 को दिव्य भूषण और 12 को दिव्यश्री से सम्मानित किया जाएगा. दिव्य पुरस्कार पाने वालों में 8 महिलाएं हैं. दिव्य पुरस्कारों के विजेताओं में 2 विदेशी माहेश्वरी व्यक्ति भी शामिल हैं. चयन समिति के अध्यक्ष एस. बी. लोहिया ने बताया की इस वर्ष के पुरस्कारों के लिए 550 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए थे.

दिव्य पुरस्कार विजेताओं की सूची -

दिव्य विभूषण पुरस्कार विजेता - 2018
1. रेणू खटोड़ (अमेरिका) - शिक्षा और सामाजिक कार्य,
2. श्री श्यामसुन्दरजी सोनी (महाराष्ट्र) - सामाजिक कार्य एवं संगठन के पदाधिकारी के रूप में उकृष्ट कार्य

दिव्य भूषण पुरस्कार विजेता - 2018
1. पलक मुछाल (मध्यप्रदेश) - कला एवं सामाजिक कार्य,
2. निकिता चांडक (नेपाल) - मिस नेपाल-2017,
3. श्री श्यामजी जाजू (देहली) - सामाजिक कार्य,
4. स्मृति मानधना (महाराष्ट्र) - खेल (क्रिकेट),
5. श्री महेशजी राठी (महाराष्ट्र) - सामाजिक कार्य एवं पर्यावरण,
6. श्री जुगलकिशोरजी बिड़ला (राजस्थान) - सामाजिक कार्य

दिव्यश्री पुरस्कार विजेता - 2018
1. श्री संजयजी मालपानी (महाराष्ट्र) - उद्योग एवं सामाजिक कार्य,
2. श्री राधेश्यामजी साबु  (मध्यप्रदेश) - समाजसेवा,
3. नम्रता करवा (राजस्थान) - कला (आध्यात्मिक गायिका / भजन सिंगर),
4. श्री ओमजी चांडक (राजस्थान) - सामाजिक कार्य,
5. रितु माहेश्वरी (उत्तरप्रदेश) - लोक सेवा (सिविल सर्विस), 
6. श्री विपिनजी माहेश्वरी (मध्यप्रदेश) - लोक सेवा (सिविल सर्विस),
7. श्री किकू शारदा (महाराष्ट्र) - कला (अभिनय),
8. श्री पुष्करजी बाहेती (मध्यप्रदेश) - पत्रकारिता,
9. श्री शरदजी बागड़ी (महाराष्ट्र) - लेखक एवं पत्रकारिता,
10. श्री मोहितजी सोडानी (राजस्थान) - खेल (ड्राप रो बॉल एवं क्रिकेट),
11. साक्षी चितलांगे (महाराष्ट्र) - खेल (चेस),
12. श्रद्धा मूंदड़ा लड्डा (महाराष्ट्र) - योगा.

क्या है दिव्य पुरस्कार

दिव्य पुरस्कार माहेश्वरी समाज के सर्वोच्च पुरस्कारों में से एक है. यह माहेश्वरी समाज के अंतरराष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार है. दिव्य पुरस्कार 3 श्रेणियों में प्रदान किए जाते हैं- दिव्यश्री, दिव्य भूषण, दिव्य विभूषण. माहेश्वरी अखाड़ा द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिए जानेवाले माहेश्वरी समाज के सर्वोच्च सम्मान 'माहेश्वरी रत्न’ के बाद क्रमशः चौथे, तीसरे और दूसरे स्थान पर दिव्यश्री, दिव्य भूषण और दिव्य विभूषण यह श्रेष्ठ पुरस्कार है.

दिव्य पुरस्कार आम तौर पर सिर्फ माहेश्वरीयों कों दिए जाने वाले सम्मान है जो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों जैसे कि, अध्यात्म, कला, शिक्षा, उद्योग, साहित्य, विज्ञान, खेल, चिकित्सा, समाज सेवा और सार्वजनिक जीवन आदि में उनके विशिष्ट योगदान के लिए दिए जाते है. इस सम्मान में एक पदक और प्रशस्ति पत्र (सम्मान पत्र) दिया जाता है. यह पुरस्कार प्रतिवर्ष दिसंबर माह में घोषित किये जाते है तथा सामान्यतः मार्च/अप्रैल/मई माह में महेशाचार्य द्वारा प्रदान किये जाते हैं.


Divy Bhushan Shri Mahesh Ji Rathi

राममंदिर आंदोलन के प्रथम शहीद कोठारीबंधुओं पर माहेश्वरी समाज को गर्व


जोधपुर में 5 जनवरी 2019 से दो दिवसीय "अंतरराष्ट्रीय माहेश्वरी महाअधिवेशन" होने जा रहा है. माहेश्वरी अखाड़े के पीठाधिपति महेशाचार्य प्रेमसुखानन्दजी माहेश्वरी महाराज ने माहेश्वरी महाअधिवेशन के आयोजकों एवं वहां उपस्थित समाजजनों से आवाहन किया है की अयोध्या में रामजन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर के बारेमें माहेश्वरी समाजभावना को दर्शाने के लिए इस माहेश्वरी महाअधिवेशन में समस्त माहेश्वरी समाज की ओरसे "राम मंदिर बनाने का मार्ग प्रशस्त करें सरकार, जल्द से जल्द बने राम जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर" ऐसा प्रस्ताव पारित किया जाये. 

माहेश्वरी वीर सपूतों राम कोठारी और शरद कोठारी ने अयोध्या में राम जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर बनाने के आंदोलन में जान का बलिदान देकर समस्त माहेश्वरी समाज को गौरवान्वित किया, राम जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर के समस्त रामभक्तों एवं हिन्दू समाजजनों के सपने को, संकल्प को साकार करने की कोशिश में अपनी जान का बलिदान दिया. समस्त हिन्दू समाज का वो सपना अभी भी साकार नहीं हुवा है. माहेश्वरीरत्न कोठारीबंधुओं के सपने को साकार करने के संकल्प के साथ जोधपुर में होने जा रहे अंतरराष्ट्रीय माहेश्वरी महाअधिवेशन में राम मंदिर आंदोलन के प्रथम शहीद माहेश्वरीरत्न कोठारीबंधुओं को, उनके कार्य को, उनके बलिदान को याद करते हुए इस पुरे अधिवेशन में मंच पर कोठारीबंधुओं की प्रतिमा रखी जाये तथा उन्हें समस्त माहेश्वरी समाज की ओरसे श्रद्धांजलि समर्पित की जाये ऐसी भावना व्यक्त करते हुए "सरकार जल्द से जल्द राम मंदिर बनाने का मार्ग प्रशस्त करें" ऐसा प्रस्ताव पारित करने का आवाहन भी महेशाचार्य प्रेमसुखानन्दजी ने किया है.


क्या फर्क है इन 2 सिम्बॉल के बिच में? इनमें से कौनसा सिम्बॉल है सर्वोच्च?


देश के सिम्बॉल अशोकचक्रवाले तिरंगे और भाजपा का सिम्बॉल कमल के फूल में जितना फर्क है उतना ही फर्क है माहेश्वरी समाज के सिम्बॉल "मोड़' और महासभा के सिम्बॉल कमल के फूल पर शिवलिंगवाले सिम्बॉल में.

जैसे तिरंगा हरएक भारतीय की, भारत देश की पहचान है और कमल का फूल यह सिम्बॉल भारतीय जनता पार्टी का सिम्बॉल है, जो वर्तमान समय में सत्ताधारी पार्टी है तथा देश का नेतृत्व कर रही है; वैसे ही 'मोड़' (एक त्रिशूल जिसके बिच के पाते में एक वृत्त और वृत्त के मध्य में ॐ होता है) हरएक माहेश्वरी की, माहेश्वरी समाज की पहचान है और कमल के फूल पर शिवलिंगवाला सिम्बॉल 'माहेश्वरी महासभा' इस संगठन का सिम्बॉल है, जो वर्तमान समय में माहेश्वरी समाज का नेतृत्व कर रहा है.

मोड़ (एक त्रिशूल जिसके बिच के पाते में एक वृत्त और वृत्त के मध्य में ॐ होता है), यह सिम्बॉल माहेश्वरी समाज का, माहेश्वरी संस्कृति का प्रतीकचिन्ह (सिम्बॉल) है, गौरवचिन्ह है. समाज का नेतृत्व करनेवाले संगठन का यह पहला कार्य होता है की समाज के संस्कृति का, समाज की विशिष्ठ पहचान का, समाज के प्रतीकों का, गौरवचिन्हों का संरक्षण-संवर्धन करें... लेकिन पता नहीं माहेश्वरी समाज का नेतृत्व करनेवाला संगठन 'माहेश्वरी महासभा' क्यों समाज के प्रतीकचिन्ह 'मोड़' की उपेक्षा करता है, उसे अनदेखा करता है. अबतक जो हुवा सो हुवा लेकिन अब महासभा को माहेश्वरी समाज के प्रतीकचिन्ह 'मोड़' का पुरे सम्मान और प्रोटोकॉल के अनुसार प्रयोग करना चाहिए.

संगठन में तो कुल समाज के कुछ दस-बीस प्रतिशत लोग सदस्य बनते है, संगठन का सिम्बॉल उन संगठन के सदस्यों की, संगठन की पहचान होता है लेकिन समाज का प्रतीकचिन्ह (सिम्बॉल) समस्त समाज की, समाज के हरएक व्यक्ति की पहचान होता है. समाज का प्रतीकचिन्ह समस्त समाज को एकता के अटूट बंधन में बांधे रखने का कार्य करता है इसलिए यह जरुरी है की समाज के प्रतीकचिन्ह का यथोचित एवं ससम्मान प्रयोग किया जाये. आम माहेश्वरी लोग अपनी अपनी क्षमता के अनुसार, उन्हें जो मंच मिले, जो माध्यम मिले उसका प्रयोग करके माहेश्वरी समाज के मूल प्रतीकचिन्ह की पहचान को, समाज की इस विशिष्ठ पहचान को कायम रखने का प्रयास कर रहे है, इसके लिए इनका जितना अभिनन्दन किया जाये, धन्यवाद किया जाये... कम ही है; लेकिन ना जाने क्यों समाज का नेतृत्व करनेवाला संगठन 'माहेश्वरी महासभा' अपने संगठन के सिम्बॉल को ही समाज का सिम्बॉल सिद्ध करने की गलत कोशिश करता रहा है, कर रहा है. महासभा को समझना चाहिए की उनकी यह कोशिश कभी भी सफल तो हो ही नहीं सकती क्योंकि कहीं ना कही, कोई ना कोई अपने समाज के इस गौरवचिन्ह "मोड़" के सम्मान की लड़ाई लड़ता रहेगा. समाज का जो गौरवचिन्ह पिछले 5000 वर्षों में भुलाया नहीं जा सका, क्या आगे उसे भुलाया जाना संभव है? अ. भा. माहेश्वरी महासभा यह संगठन खुद को समाज से ऊपर समझने लगा है यह धारणा आम माहेश्वरीयों मन में घर कर जाये और आम माहेश्वरी लोग महासभा से दुरी बना लें इससे पहले महासभा अतीत में हुई अपनी भूलों को सुधार लें यह महासभा के भी हित में है और समाज के भी हित में है.

जैसे कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं बल्कि देश सर्वोपरि होता है वैसे ही समाज के लिए कार्य करनेवाला कोई भी संगठन नहीं बल्कि समाज सर्वोपरि होता है. सिर्फ अपने संगठन को ही समाज समझने की जो भूल जाने-अनजाने में अबतक महासभा से हुई है, लेकिन अब आशा करते है की महासभा अपनी भूल को दुरुस्त करके सही मायने में समस्त माहेश्वरी समाज का नेतृत्व करने की और अग्रेसर होगी. महासभा खुद को समाज पर शासन करनेवाला संगठन नहीं समझें बल्कि समाजसेवक बनकर समाज की सेवा करनेवाला संगठन बने यह ना सिर्फ समाज के बल्कि महासभा के भी हित में होगा. समाज और समाज का नेतृत्व करनेवाला संगठन, इन दोनों के बिच के फर्क को समझे महासभा. इस बात के सार को समाज को, समाजजनों को भी समझना चाहिए. समाज के लोगों को यह बात समझ में नहीं आना ऐसा है जैसे देश के सिम्बॉल अशोकचक्रवाले तिरंगे और भाजपा का सिम्बॉल कमल के फूल में क्या फर्क है यह समझ में नहीं आना.

समाज का सिम्बॉल और संगठन का सिम्बॉल इन दोनों के बिच के फर्क को अधिक विस्तार से समझने के लिए कृपया इस link पर click कीजिये >